पदक से हमारे जीवन में कोई बदलाव आएगा : महिला हॉकी खिलाड़ी
Thursday, 08 August 2013 06:44

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नई दिल्ली: ओलम्पिक या विश्वकप में एक पदक जीतने से अमूमन किसी एथलीट के जीवन में काफी बदलाव आ जाता है। क्या विश्वकप में कांस्य पदक जीतने वाली भारतीय महिला जूनियर हॉकी खिलाड़ियों के साथ भी ऐसा होगा? लेकिन उन्हें इस बात का भरोसा नहीं है, और वे अभी भी अपने भविष्य को लेकर चिंतित हैं।

जर्मनी के मोंचेनग्लादबाक में हाल ही में संपन्न हुए महिला जूनियर हॉकी विश्वकप में ऐतिहासिक जीत दर्ज करते हुए कांस्य पदक लाने वाली भारतीय लड़कियां इन दिनों देश में चर्चा के केंद्र में हैं। लेकिन उन्हें नहीं लगता कि वे बहुत दिनों तक इस उपलब्धि के लिए याद रखी जाएंगी।

कांस्य पदक विजेता इस भारतीय टीम की अधिकतर खिलाड़ियों के लिए एक लाख रुपये की सहायता मामूली ही है, क्योंकि टीम की आठ खिलाड़ियों के पास तो कोई नौकरी तक नहीं है।

मंजीत कौर के पिता कुरुक्षेत्र के शाहबाद में किसान हैं। मंजीत ने आईएएनएस से कहा, "हम अपनी उपलब्धि से बहुत खुश हैं। लोग हमसे बात करना चाहते हैं, हमारा साक्षात्कार लेना चाहते हैं, हमारी तस्वीरें खींचना चाहते हैं। यह सब तो ठीक है, लेकिन जब तक इस सफलता से हमारे जीवन में कोई सकारात्मक बदलाव नहीं आता, हममें से अधिकतर के लिए एक लाख की सहायता का कोई मतलब नहीं होगा।"

मंजीत ने आगे कहा, "पुरस्कार राशि में से 10,000 रुपये पहले ही कर ले लिया जाता है, और शेष 90,000 रुपये खेल के लिए जरूरी अच्छे सामान खरीदने में ही खत्म हो जाएंगे। मैं उम्मीद करती हूं कि मैं अपने पिता के लिए इसमें से कुछ बचा सकूंगी।"

दूसरी तरफ क्रिकेट पर नजर डाली जाए तो 2012 में विश्वकप जीतने वाली अंडर-19 क्रिकेट टीम के प्रत्येक खिलाड़ी को 20-20 लाख रुपये दिए गए थे। उल्लेखनीय है कि उन्होंने यह खिताब तीसरी बार जीता था।

वहीं, हॉकी टीम की इन लड़कियों को कितनी कठिन मेहनत करनी पड़ती है, इसका अंदाजा दूसरे खेलों से जुड़े खिलाड़ियों को शायद ही हो। उन्हें अपने वरिष्ठ खिलाड़ियों से उधार लिए गए जूतों और हॉकी से खेलना पड़ता है। यहां तक कि कई बार तो उन्हें फटे पुराने कपड़ों एवं खेल उपकरणों के साथ खेलना पड़ता है।

नवनीत कौर ने आईएएनएस को बताया, "मेरे अभिभावकों ने बताया कि उनसे गांववालों ने कहा कि उन्हें हम पर नाज है। हम इससे बेहद रोमांचित हैं। फिर ऐसा क्यों होता है कि लड़कियों की उपलब्धि की तुलना कभी भी लड़कों से नहीं की जाती।"

नवनीत के पिता एअरकंडीशनर की मरम्मत का काम करते हैं। नवनीत ने कहा कि आर्थिक तंगी के कारण उसे सोचना पड़ता है कि उसे अपना खेल जारी रखना चाहिए या अपने भविष्य को सुरक्षित रखने के लिए कुछ और करना चाहिए।

लगभग यही स्थिति टीम की सभी लड़कियों की भी है, भले ही उनमें से कुछ को छोटी-मोटी नौकरी मिली हुई है। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिस्पर्धा करने के लिए आवश्यक सुविधाएं जुटा पाना अभी उन सबके लिए दूर की कौड़ी बनी हुई है।

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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