जेल बंदियों के बच्चों की जिंदगी बदलने में जुटे जिलाधिकारी संजय अलंग!
Monday, 01 July 2019 16:33

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बिलासपुर: आम तौर पर सरकारी अधिकारी, कर्मचारी अपनी आधिकारिक जिम्मेदारियों को निभाने तक ही सीमित रहते हैं, मगर छत्तीसगढ़ के बिलासपुर जिले के जिलाधिकारी (कलेक्टर) डॉ. संजय कुमार अलंग जेल में विभिन्न अपराधों में बंद कैदियों के बच्चों की जिंदगी बदलने में जुटे हुए हैं।

बिलासपुर के केंद्रीय जेल में पहुंचे जिलाधिकारी अलंग ने एक छह साल की मासूम खुशी (बदला हुआ नाम) को महिला कैदियों के बीच देखा तो उन्होंने उसी मौके पर कह दिया कि अब खुशी जिले के किसी बड़े स्कूल में पढ़ने जाएगी। इसके लिए डॉ. अलंग ने स्थानीय स्कूल संचालकों से बात की, और कई स्कूल संचालक खुशी को खुशी-खुशी अपने स्कूल में पढ़ाने को तैयार हो गए।

डॉ. अलंग वादे के मुताबिक खुशी को बीते सप्ताह अपनी कार में बैठाकर केंद्रीय जेल से स्कूल छोड़ने गए। खुशी कलेक्टर की उंगली पकड़कर स्कूल के अंदर तक गई। खुशी एक हाथ में बिस्किट और दूसरे में चाकलेट लिए हुए थी और वह स्कूल जाने के लिए जेल में सुबह ही तैयार हो गई थी।

डॉ. अलंग कहते हैं, "जेल में रहने से बच्चों का मानसिक विकास नहीं हो पाता है। मैंने जेल में देखा कि मासूम बच्चे भी हैं, और तभी मैंने तय कर लिया कि बच्चों को पढ़ने के लिए जेल के बाहर स्थित स्कूल भेजा जाएगा।"

बीते सप्ताह जब खुशी डॉ. अलंग के साथ स्कूल जा रही थी, तब उसके पिता खुशी से गले लिपटकर रो पड़े थे। लेकिन खुशी तो बेहद खुश थी कि अब वह स्कूल के छात्रावास में ही रहेगी और 12वीं तक की पढ़ाई स्कूल में रहकर करेगी।

जैन इंटरनेशनल स्कूल के संचालक अशोक अग्रवाल का कहना है कि खुशी की पढ़ाई और छात्रावास का खर्च स्कूल प्रबंधन ही उठाएगा।

जिलाधिकारी अलंग की पहल को बड़ी उपलब्धि बताते हुए मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने भी ट्वीट कर कहा, "बिलासपुर कलेक्टर के मानवीय कदम की जितनी प्रशंसा की जाए कम है। साथ ही जेल प्रशासन एवं स्थानीय प्राशासन भी बधाई का पात्र है। आखिर हम सब जनता के ही तो सेवक हैं। ऐसे कदमों से जनता का सरकार और प्रशासन पर विश्वास और बढ़ेगा।"

जेल सूत्रों के अनुसार, "खुशी के पिता केंद्रीय जेल बिलासपुर में एक अपराध में सजायाफ्ता कैदी हैं। पांच साल की सजा काट ली है, पांच साल और जेल में रहना है। खुशी जब पंद्रह दिन की थी, तभी उसकी मां की मौत पीलिया से हो गई थी। पालन-पोषण के लिए घर में कोई नहीं था। इसलिए उसे जेल में ही पिता के पास रहना पड़ रहा था। जब वह बड़ी होने लगी तो उसकी परवरिश का जिम्मा महिला कैदियों को दे दिया गया। वह जेल के अंदर संचालित प्ले स्कूल में जाती थी।"

जिलाधिकारी की पहल पर जेल में रह रहे ऐसे 17 अन्य बच्चों को भी जेल से बाहर स्कूल में दाखिला दिलाने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है। इन सभी बच्चों को स्कूलों में दाखिला दिलाने के लिए स्कूल संचालकों से बात की जा रही है। जिले के कई स्कूल ऐसे हैं, जिनके संचालक इन बच्चों को अपने स्कूलों में रखने के लिए तैयार हो गए हैं।

--आईएएनएस

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